Saturday, November 30, 2013
एक कोशिश=
दे दे के थक गए हैं जवाबात किस क़दर।
करने लगे हैं आप सवालात किस क़दर।
वो चाहते यही थे हमेशा से दोस्तो,
तब ही तो बढ़ रहे हैं फसादात किस क़दर।
जो हमख्याल था मेरा, ग़मख्वार था बहुत,
उसके बदल गए हैं ख्यालात किस क़दर।
इक खुशनुमा सहर का है मुद्दत से इन्तिज़ार,
लम्बी है ग़मों से भरी ये रात किस क़दर।
अम्नो अमां के शहर में अफ़सोस है ए "दिल"
बरसा रहे हैं आग ये हालात किस क़दर।
=दिलशेर "दिल"
Friday, January 27, 2012
Wednesday, November 2, 2011
ghazal
जहाँ भी देखता हूँ बस, तेरे रुखसार के किस्से.
तेरे गुस्से की हैं बातें, तुम्हारे प्यार के किस्से.
अजब है रात का आलम, अजब सुब्हा का है मौसम,
गज़ब तेरी वो अँगड़ाई, गज़ब दीदार के किस्से.
Wednesday, March 23, 2011
Tuesday, October 12, 2010
माँ मेरी मुझसे अक्सर ये कहती है
माँ मेरी मुझसे अक्सर ये कहती है
ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है
दादी बिस्तर पर बीमार पड़ी है,
चाची भी सिरहाने चुपचाप खड़ी है,
गोलू, मुन्नू, पप्पू भी अब शोर नहीं करते,
चाचा की छोटी बिटिया भी अब चुप रहती है,
फिर भी माँ मेरी मुझसे ये क्यों कहती है,
ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है।
दीदी तो माँ जैसी है उनकी की बातें करना क्या
छोटी की शादी हो गई, उसके संग भी रहना क्या,
जीजू के ज़ुल्मों को मझली चुपचाप सहे जाती,
पहले हस्ती रहती थी, अब गुमसुम रहती है,
फिर भी माँ मेरी मुझ से अक्सर ये कहती है,
ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है।
भैया के संग खेले थे, पल वो रीत गए,
इस घर के खुशियों वाले दिन भी बीत गए,
बापू की सूखी आँखों से एक नदिया बहती है,
फिर भी माँ मेरी मुझसे अक्सर ये कहती है,
ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है।
इस घर में रहकर बच्चे ने इतना तो अब सीख लिया,
सब का कहना कर डाला, पर मन का नहीं किया,
उसकी मम्मी की हालत अब मैं कैसे बतलाऊं,
पहले चिड़िया जैसी थी, अब सहमी रहती है।
माँ मेरी मुझसे अक्सर ये कहती है,
ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है
= दिलशेर "दिल" दतिया
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