Friday, January 27, 2012

इश्क में दिल का ये हाल होता है।
उसके बिन जीना मुहाल होता है।
मेरे आंसू उसकी आँखों से निकलते हैं,
प्यार में ये भी कमाल होता है।

Wednesday, November 2, 2011

ghazal

जहाँ भी देखता हूँ बस, तेरे रुखसार के किस्से.
तेरे गुस्से की हैं बातें, तुम्हारे प्यार के किस्से.
अजब है रात का आलम, अजब सुब्हा का है मौसम,
गज़ब तेरी वो अँगड़ाई, गज़ब दीदार के किस्से.

Wednesday, March 23, 2011

हर तरफ बस तबाही का मंज़र दिखाई देता है।

पैरों तले ज़मीं नहीं, समंदर दिखाई देता है।

दिलशेर दिल

Tuesday, October 12, 2010

माँ मेरी मुझसे अक्सर ये कहती है

माँ मेरी मुझसे अक्सर ये कहती है

ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है

दादी बिस्तर पर बीमार पड़ी है,

चाची भी सिरहाने चुपचाप खड़ी है,

गोलू, मुन्नू, पप्पू भी अब शोर नहीं करते,

चाचा की छोटी बिटिया भी अब चुप रहती है,

फिर भी माँ मेरी मुझसे ये क्यों कहती है,

ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है।

दीदी तो माँ जैसी है उनकी की बातें करना क्या

छोटी की शादी हो गई, उसके संग भी रहना क्या,

जीजू के ज़ुल्मों को मझली चुपचाप सहे जाती,

पहले हस्ती रहती थी, अब गुमसुम रहती है,

फिर भी माँ मेरी मुझ से अक्सर ये कहती है,

ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है।

भैया के संग खेले थे, पल वो रीत गए,

इस घर के खुशियों वाले दिन भी बीत गए,

बापू की सूखी आँखों से एक नदिया बहती है,

फिर भी माँ मेरी मुझसे अक्सर ये कहती है,

ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है।

इस घर में रहकर बच्चे ने इतना तो अब सीख लिया,

सब का कहना कर डाला, पर मन का नहीं किया,

उसकी मम्मी की हालत अब मैं कैसे बतलाऊं,

पहले चिड़िया जैसी थी, अब सहमी रहती है।

माँ मेरी मुझसे अक्सर ये कहती है,

ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है

= दिलशेर "दिल" दतिया

Wednesday, May 12, 2010

- अशआर -
रौशनी में नहाकर चला हूँ।
मैं अंधेरों में हरदम जिया हूँ।
तुम्हे मालूम है? मेरा नाम क्या है?
मैं ताक में जलता हुआ एक दिया हूँ.

Wednesday, February 18, 2009

=ग़ज़ल=

मुक़द्दस लिबास पहने हुए मकान में हूँ!

ए ज़मीन! अब में तेरी अमान में हूँ!

ज़िन्दगी महफिलों में खर्च कर दी हमने,

अब आज मैं इस बियाबान में हूँ!

अब हिंदू - मुसलमान की बातें रहने भी दो,

ये ही बहुत है की मैं इंसान में हूँ!

माथे पे शिकन, न आंखों में कोई खौफ है,

मुझे फख्र है, की मैं हिंदुस्तान में हूँ!

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= चंद अशआर=

शहर में शेर की मांद कहाँ से लाऊं!

बेटा! ज़मीं पे चाँद कहाँ से लाऊं!

मेहनत और इमानदारी के पैसों में,

अम्मा! कोरमा - नांद कहाँ से लाऊं!

***

तख्ती हमारे नाम की अब दर से हटा दी!

चादर कोई पुरानी थी, बिस्तर से हटा दी!

बच्चों ने नए ढंग से कमरों को सजाया,

तस्वीर भी हमारी अब इस घर से हटा दी!

***

वो जुबां की तल्खियां पसंद नहीं करते!

समंदर भी टूटी कश्तियाँ पसंद नही करते!

जो ऊँची-ऊँची इमारतें बनते हैं वो,

हमारी गरीब बस्तियां पसंद नहीं करते!

हवा भी पाबन्द-ऐ-वफ़ा नहीं इसलिए,

अब फूल भी तितलियाँ पसंद नहीं करते!

***

Friday, February 6, 2009

-ग़ज़ल-

लोरियां सुनाती है!

जब भी नींद आती है!

सिसकियाँ मिटाने को,

वो गले लगाती है!

(poori karna hai)