उसके बिन जीना मुहाल होता है।
मेरे आंसू उसकी आँखों से निकलते हैं,
प्यार में ये भी कमाल होता है।
माँ मेरी मुझसे अक्सर ये कहती है
माँ मेरी मुझसे अक्सर ये कहती है
ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है
दादी बिस्तर पर बीमार पड़ी है,
चाची भी सिरहाने चुपचाप खड़ी है,
गोलू, मुन्नू, पप्पू भी अब शोर नहीं करते,
चाचा की छोटी बिटिया भी अब चुप रहती है,
फिर भी माँ मेरी मुझसे ये क्यों कहती है,
ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है।
दीदी तो माँ जैसी है उनकी की बातें करना क्या
छोटी की शादी हो गई, उसके संग भी रहना क्या,
जीजू के ज़ुल्मों को मझली चुपचाप सहे जाती,
पहले हस्ती रहती थी, अब गुमसुम रहती है,
फिर भी माँ मेरी मुझ से अक्सर ये कहती है,
ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है।
भैया के संग खेले थे, पल वो रीत गए,
इस घर के खुशियों वाले दिन भी बीत गए,
बापू की सूखी आँखों से एक नदिया बहती है,
फिर भी माँ मेरी मुझसे अक्सर ये कहती है,
ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है।
इस घर में रहकर बच्चे ने इतना तो अब सीख लिया,
सब का कहना कर डाला, पर मन का नहीं किया,
उसकी मम्मी की हालत अब मैं कैसे बतलाऊं,
पहले चिड़िया जैसी थी, अब सहमी रहती है।
माँ मेरी मुझसे अक्सर ये कहती है,
ख़ुशी दरवाज़े पर आकर दस्तक देती है
= दिलशेर "दिल" दतिया
=ग़ज़ल=
मुक़द्दस लिबास पहने हुए मकान में हूँ!
ए ज़मीन! अब में तेरी अमान में हूँ!
ज़िन्दगी महफिलों में खर्च कर दी हमने,
अब आज मैं इस बियाबान में हूँ!
अब हिंदू - मुसलमान की बातें रहने भी दो,
ये ही बहुत है की मैं इंसान में हूँ!
माथे पे शिकन, न आंखों में कोई खौफ है,
मुझे फख्र है, की मैं हिंदुस्तान में हूँ!
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= चंद अशआर=
शहर में शेर की मांद कहाँ से लाऊं!
बेटा! ज़मीं पे चाँद कहाँ से लाऊं!
मेहनत और इमानदारी के पैसों में,
अम्मा! कोरमा - नांद कहाँ से लाऊं!
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तख्ती हमारे नाम की अब दर से हटा दी!
चादर कोई पुरानी थी, बिस्तर से हटा दी!
बच्चों ने नए ढंग से कमरों को सजाया,
तस्वीर भी हमारी अब इस घर से हटा दी!
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वो जुबां की तल्खियां पसंद नहीं करते!
समंदर भी टूटी कश्तियाँ पसंद नही करते!
जो ऊँची-ऊँची इमारतें बनते हैं वो,
हमारी गरीब बस्तियां पसंद नहीं करते!
हवा भी पाबन्द-ऐ-वफ़ा नहीं इसलिए,
अब फूल भी तितलियाँ पसंद नहीं करते!
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